पिछोला में सीवरेज लाइन डालने का आईडिया कब, कैसे और क्यूँ आया

 पिछोला में सीवरेज लाइन डालने का आईडिया कब, कैसे और क्यूँ आया

पिछोला झील में सिवरेज लाइन में रिसाव से झील का पानी प्रदूषित हुआ, यह खबर तो आपने अखबारों में पढ़ी ही होगी.

अब सोचिये – क्या कभी आप अपने रसोई में से गटर की लाइन निकालेंगे? रसोई जहाँ खाना पकता है और खाया भी जाता है घर की सबसे साफ़ और स्वच्छ रखने वाली जगह है, यहाँ यदि किसी तरह की गंदगी हुई तो खाने पर फिर सभी परिवार वालो के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा.

अब बताइए – किसने कब और कैसे यह सोच लिया कि झील जिसपर शहर का जीवन डिपेंड है उसके अंदर से सीवरेज की लाइन निकाली जाए, उस पर भी कोई प्लान-बी नहीं बनाया गया कि कभी लाइन चोक हुई या लीक हुई तो क्या होगा, उसका परिणाम कौन भुगतेगा ?.

और वही हुआ !

लीकेज की वजह से सीवरेज में बहता मल मूत्र हमारी पिछोला झील में मिला और अमृत जल विषैला हो गया. लोगो का गुस्सा फूटा तो प्रशासन जागा, यह भी मान लिया कि झीलों में सीवरेज लाइन डालना एक “भूल” थी. अब भूल सुधारने के लिए फिर से सीवरेज लाइन को हटाया जायेगा.

उदयपुर में झील और पर्यावरण संरक्षक अनिल मेहता ने सोशल मीडिया पर एक कमेंट में बताया कि आखिर कब, कैसे और क्यूँ उदयपुर प्रशासन ने पिछोला में सीवरेज लाइन डालने का शानदार काम किया.   

अनिल मेहता लिखते है ….

उदयपुर की झीलें जिनका पानी पीने के काम आता है, उसके पेटे से सीवर लाइन निकालना एक आत्मघाती कदम था।

वर्ष 1998 – 99 में जब झीलों को सीवर प्रवाह से मुक्त करने की योजना बन रही थी , तब मूल योजना में झील परिधि में सीवर लाइने बिछा कर सीवर को झील से दूर ले जाना ही था।

लेकिन तब ये तर्क दिया गया कि इससे परिधि के बड़े क्षेत्र में रोड काटकर जमीन के नीचे सीवर लाइन बिछानी पड़ेगी,  बहुत खर्चा होगा और इसलिए सबसे आसान है कि झील पेटे से ही लाइन निकाल दो। इस तर्क को प्रस्तुत करने वालों को संभागीय आयुक्त ने प्रशंसा पत्र भी दिया।

लेकिन लागत के इस आंकलन में यह हिसाब नही लगाया गया कि पेयजल की झीलों में यदि किसी कारणवश रिसाव हुआ, लाईनों में टूट फुट, चोकिंग हुई और सीवर पीने के पानी मे मिल गया तो कितनी गंभीर हानि होगी। जनस्वास्थ्य को ताक में रख सीवर लाइने झील में पेटे में बिछा दी गई। कई मेनहोल भी बन गए ।

इस योजना को पूरी होते होते वर्ष 2005 में जब मानसून आया तो सीवर लाइनों का लीकेज, सीवर लाइनों में झील के पानी के प्रवेश की गलतियां स्पष्ठ नजर आने लगी।

वर्ष 2007 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि झीलों का लिमनोलॉजिकल ( सरोवर विज्ञानीय) , हाइड्रोलॉजिकल( जल विज्ञानीय) तथा इकोलॉजिकल ( पारिस्थितिकीय) संरक्षण किया जाए।

इसका अभिप्राय शायद आज तक सरकारी एजेंसियां नही समझ पाई।

इस दौरान ही राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना स्वीकृत हुई। उद्घाटन करते हुए तत्कालीन पर्यावरण मंत्री नमोनारायण मीणा ने कहा कि योजना पूरी होने के बाद झीलों का पानी नीला कच होगा।

एक के बाद एक कलेक्टर बदलते गए, नगर निगम आयुक्त व नगर विकास प्रन्यास के सचिव बदलते गए। सभी एक मत में मानते रहे कि झील में सीवर लाइन बिछाने का कार्य एक बड़ी गलती हो गई है। अतः इसे बाहर निकाला जाए।

योजना भी बन गई।  विशेषज्ञ  को बुलाकर लाइने बाहर निकालने की योजना भी बन गई।

कार्य भी शुरू हुआ। कुछ लाइने हटी है। विश्वास किया जाना चाहिए कि वर्तमान जिला प्रशासन, निगम व प्रन्यास के पदाधिकारी शीघ्र ही पूरी झील पेटे को सीवर लाइन से मुक्त करेंगे.

……

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1 Comment

  • झील संरक्षण समिति संभवत: 1998-99 से पहले से कार्यरत है। झील के पेटे में यह लाइन बिछाने की (तथाकथित ग़लत) योजना बनी तो क्या समिति ने लिखित विरोध किया था?

    जिस किसी ने प्रशंसा पत्र लिया उसका नाम बताने में क्या कठिनाई है ? (ताकि वे जो कोई भी अपनी बात कह सकें।)

    और क्या अब पूरी लाइन को झील से बाहर निकालना ज़रूरी है या इसके जितने मुँह (outlet – inlet) को गिट्टी भरकर बंद करने से भी काम चल सकता है। समाचार पत्रों के अनुसार लाइन बाहर निकालने का खर्च 11 करोड़ रूपये है जबकि सारे मुँह ज़्यादा से ज़्यादा 7-8 लाख रूपये में बंद हो सकते हैं ऐसा अनुमान है।

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