उदयपुर झील प्रणाली वेटलैंड को अधिसूचना से बाहर रखना अन्याय !


राजनीतिक दल उदयपुर के लिए आवाज उठाएं*
उदयपुर की झील प्रणाली वेटलैंड को राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित नही करने पर झील प्रेमियों ने गंभीर आक्रोश व्यक्त किया है ।
रविवार को आयोजित झील संवाद मे झील विशेषज्ञ डॉ अनिल मेहता ने कहा कि प्रदेश के 19 जिलों की 44 वेटलैंड को अधिसूचना मे सम्मिलित किया है । इनमे बारां की बारह, चित्तौड़ की चार, टौंक की छह, कोटा की तीन, जोधपुर, बीकानेर, पाली, राजसमंद की दो – दो वेटलैंड सम्मिलित हुई है । लेकिन, उदयपुर जिले से केवल मेनार जलाशयों को ही इसमे रखा गया है।
मेहता ने कहा कि होटल व भूमि व्यवसाइयों तथा उनके हितैषी अफसरों ने उदयपुर झील प्रणाली वेटलैंड को अधिसूचना मे सम्मिलित नही होने दिया। उदयपुर के साथ अन्याय राजनीतिक दलों को खुली चुनौती है । लेकिन, उनके द्वारा झीलों के हित मे कोई आवाज नही उठाना अफसोसजनक है ।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि मदार व बड़ी तालाबों से लेकर उदयसागर तक परस्पर जुड़ी उदयपुर की संपूर्ण झील प्रणाली अंतर्राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण वेटलैंड है ।
इन्हे सिर्फ स्थानीय स्तर पर नोटिफाई ही नही करना है वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर की “रामसर वेटलैंड” भी घोषित करवाना चाहिए ।
गांधी मानव कल्याण समिति के निदेशक नंद किशोर शर्मा ने कहा कि उदयपुर वेटलैंड प्रणाली को पेयजल वितरण बता कर वेटलैंड के रूप मे अधिसूचित् नही होने दिया है। जबकि ये झीलें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील व महत्वपूर्ण वेटलैंड है ।
झील प्रेमी द्रुपद सिंह व कुशल रावल ने कहा कि वेटलैंड नियमो से झीलों तालाबो के किनारे, उनके टापू व आस पास का क्षेत्र संरक्षित हो जाते है। तथा इन पर व्यावसायिक निर्माण रुक जाते है। यही कारण है कि उदयपुर की झीलों के साथ उपेक्षा का व्यहवार किया जा रहा है।











