‘भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति (जनजातीय जीवन एवं भारतीय संस्कृति के विशेष संदर्भ में)’ राष्ट्रीय संगोष्ठी


भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति आधारित ऋषि परंपरा है — खराड़ी
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जनजातीय गौरव वर्ष के अंतर्गत हिंदी विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, माणिक्यलाल वर्मा आदिम शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर तथा ट्राइबल रिसर्च एंड नॉलेज सेंटर, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति (जनजातीय जीवन एवं भारतीय संस्कृति के विशेष संदर्भ में)’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान सरकार के जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री श्री बाबूलाल खराड़ी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूल रूप से प्रकृति आधारित ऋषि परंपरा है। हमारी संस्कृति ने विदेशी आक्रांताओं को भी अपनत्व भाव से समरस करने की परंपरा विकसित की है। भगवान बिरसा मुंडा का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप के अज्ञातवास में जनजाति समाज ने सच्चे साथी के रूप में सहयोग दिया। जनजाति समाज प्रकृति का सहचर है, क्योंकि प्रत्येक भारतीय प्रकृति पूजक है — इसलिए हम सब एक हैं।
खराड़ी ने कहा कि भारतीय ज्ञान पद्धति में समष्टि का विचार निहित है। आक्रमणकारियों ने हमारे गुरुकुलों को समाप्त किया, फिर भी हमारी शिक्षा समरसता और विश्व कल्याण की उपासक रही। उन्होंने परिवारों में बढ़ती विघटन की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए परिवार प्रबोधन की आवश्यकता बताई। कहा कि प्रकृति सामाजिक दूरियों को कम करती है, और आदिवासी समाज भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। इस अवसर पर उन्होंने बिरसा मुंडा की जयंती पर सुखाड़िया विश्वविद्यालय में जनजातीय शोध पीठ की स्थापना का आश्वासन दिया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.पी. सारस्वत ने कहा कि भारतीय जीवनदर्शन में प्रकृति केवल भौतिक तत्व नहीं, बल्कि चेतन, संवेदनशील और दिव्यता का अधिष्ठान है। भारतीय परंपरा में मनुष्य और प्रकृति का संबंध उपयोग का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की जनजातीय संस्कृति प्रकृति की गोद में पली है — उनके पर्व, गीत, नृत्य और चित्रकला सब में प्रकृति का उत्सव झलकता है। जनजातीय जीवन के तीन प्रमुख सिद्धांत — संतुलित उपभोग, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामुदायिक जिम्मेदारी — आधुनिक समाज को सतत विकास की दिशा दिखाते हैं।
विशिष्ट अतिथि के रूप में बिरसा मुंडा जनजाति विश्वविद्यालय, राजपीपला (गुजरात) के कुलपति प्रो. मधुकर पाड़वी ने कहा कि प्रकृति आधारित ज्ञान परंपरा को आधार बनाकर भारत पुनः विश्व के आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्थापित होगा। उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुंबकम” का भाव प्रकृति से ही प्रेरित है और जनजातीय संस्कृति में प्रकृति शांति, सद्भाव और सह-अस्तित्व का संदेश देती है।
मुख्य वक्ता प्रो. जयंती भाई चौधरी (पूर्व राज्यपाल प्रतिनिधि, जनजाति सलाहकार समिति, गुजरात) ने कहा कि जनजाति समाज आरण्यक संस्कृति का वाहक है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की रीढ़ है। उन्होंने कहा कि जनजातीय जीवन प्रकृति के सबसे अनुकूल जीवन पद्धति है, जिसमें त्याग, संतुलन और आनंद की भावना निहित है। जंगल के जड़-चेतन तत्व उनके आराध्य हैं और यही उनकी आध्यात्मिकता का केंद्र है।
संगोष्ठी संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नवीन नंदवाना ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत और पूज्य सत्ता के रूप में देखा गया है। उन्होंने तुलसी, सूरदास और छायावादी कवियों के साहित्य में प्रकृति के विविध रूपों का उल्लेख किया। कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का बाल्यकाल और ब्रज संस्कृति प्रकृति के साथ एकात्म भाव का सुंदर उदाहरण हैं।
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से आई डॉ. संजू पूनम ने वहाँ की जनजातियों का करमा लोक नृत्य प्रस्तुत किया, वहीं भगवान बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित एक लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर डॉ. नवीन नंदवाना और डॉ. प्रेमशंकर मीणा द्वारा संपादित पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति’ का विमोचन भी किया गया।
इसके बाद ‘प्राचीन भारतीय वाङ्मय में प्रकृति दर्शन और उसका सांस्कृतिक चित्रण’ तथा ‘भारतीय भाषाओं में प्रकृति’ विषयों पर दो तकनीकी सत्र आयोजित हुए, जिनमें प्रो. नीरज शर्मा, आईआईटी जोधपुर के डॉ. विवेक विजय, वैद्य डॉ. शोभालाल औदिच्य, डॉ. राकेश डामोर (बाँसवाड़ा), डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’, डॉ. नीतू परिहार, प्रो. गणेशलाल निनामा और प्रो. मनोज पंड्या ने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नीतू परिहार ने धन्यवाद ज्ञापित किया, जबकि संचालन डॉ. नीता त्रिवेदी और डॉ. प्रियंका रावल ने किया।
समापन समारोह 11 नवम्बर को
संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान सरकार के राजस्व मंत्री श्री हेमंत मीणा उपस्थित रहेंगे। मुख्य वक्ता उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत होंगे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, नई दिल्ली के सलाहकार श्री प्रकाश सिंह उइके एवं श्री लक्ष्मण सिंह मरकाम (अतिरिक्त सचिव, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश) शामिल होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. बी.पी. सारस्वत करेंगे।
संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘जनजातीय जीवन में प्रकृति और उसका महत्व’ तथा ‘लोक जीवन, लोक कला एवं लोक साहित्य में प्रकृति’ विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे।









