प्रदूषण का जाल, सैलानियों का हाल — झीलें हो रहीं बीमार!


उदयपुर, 26 अक्टूबर। रविवार को आयोजित झील संवाद में झीलों के प्रति प्रशासनिक और नागरिक उपेक्षा पर गहरी चिंता व्यक्त की गई।
झील विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि झीलों के आसपास बढ़ते पर्यटक वाहनों के आवागमन से निकलने वाला धुआं और टायरों के घिसाव से उत्पन्न सूक्ष्म प्रदूषक कण वायु को दूषित कर रहे हैं। ये जहरीले तत्व झीलों के जल में पहुंचकर पेयजल की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सिवरेज का प्रवाह लगातार जारी है, जो स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि झीलों के किनारों पर गंदगी के ढेर लगे हैं और सफाई कर्मचारी शायद ही कहीं दिखाई देते हैं। दीपावली पर्व के बाद से ही झील सफाई में निरंतर शिथिलता बरती जा रही है।
पर्यावरणविद् नंद किशोर शर्मा ने कहा कि कचरे के पात्रों के अभाव में पर्यटक मिनरल वाटर की बोतलें, शराब की खाली शीशियां और प्लास्टिक रैपर जैसे अपशिष्ट झीलों के आसपास फेंक रहे हैं। यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है।
युवा पर्यावरण कार्यकर्ता कुशल रावल ने बताया कि केवल पर्यटक ही नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिक भी अपने घरों और दुकानों का कचरा झीलों में फेंक रहे हैं, जिससे झीलों का पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है।
वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह ने नगर निगम और यूडीए से आग्रह किया कि झीलों की स्वच्छता व्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए जिम्मेदार नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएं, ताकि इस विरासत को संरक्षित रखा जा सके।









