सुविवि- भारतीय ज्ञान परंपरा और आत्मबोध पर विशद चिंतन के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

 सुविवि- भारतीय ज्ञान परंपरा और आत्मबोध पर विशद चिंतन के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, अखिल भारतीय साहित्य परिषद तथा राजस्थान साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना’ के दूसरे और अंतिम दिन मंगलवार को विभिन्न तकनीकी सत्रों में वक्ताओं ने भारतीय दर्शन, स्वाधीनता संग्राम की स्मृतियों और भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्यापक प्रकाश डाला वहीं समापन सत्र में विद्वानों ने राष्ट्रीयता को आत्मबोध, शोध की नवीन दिशाओं और बाल संस्कारों से जोड़कर विवेचन किया।

कार्यक्रम संयोजक डॉ आशीष सिसोदिया ने बताया कि दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र के मुख्य वक्ता साहित्यकार एवं इतिहासकार डॉ श्रीकृष्ण जुगनू ने मेवाड़ की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए एक महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि देश में राष्ट्रीय चेतना की विधिवत शुरुआत मेवाड़ से ही हुई थी। उन्होंने बताया कि भारत का प्रथम कवि सम्मेलन महाराणा सज्जन सिंह के संरक्षण में मेवाड़ की धरा पर आयोजित हुआ था। डॉ. जुगनू ने कहा कि

सभी हिंदी के रचनाकारों के लिए मेवाड़ ही प्रेरणा का पुंज रहा। सभी रचनाकारों ने मेवाड़ की स्वाधीनता की चेतना को आदर्श मानकर ही राष्ट्रीय चेतना का काव्य रचा। सार्वभौमिकता और राष्ट्रबोध के तत्व हमारे वेदों-पुराणों में आदि काल से विद्यमान हैं। उन्होंने भाषाई समृद्धि पर चर्चा करते हुए बताया कि हिंदी भाषा को सर्वाधिक शब्द राजस्थानी भाषा ने उपहार स्वरूप दिए हैं। उनके अनुसार, “भारत परिक्रमाओं की भूमि है; जो एक बार यहाँ आता है, वह अंततः भारतीयता के रंग में रंग जाता है, यही हमारी चेतना की सबसे बड़ी विशेषता है।” विशिष्ट अतिथि राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. बसंत सिंह सोलंकी ने शोधार्थियों का ध्यान राजस्थान के अभिलेखागारों की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि अभिलेखागारों में अनगिनत पांडुलिपियाँ, ताम्रपत्र और ग्रंथ आज भी शोध की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने आह्वान किया कि जब तक हम अपनी मूल ज्ञान संपदा और इतिहास का गहन अध्ययन नहीं करेंगे, तब तक हमारा आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना अधूरी ही रहेगी।

संगोष्ठी के समन्वयक आशा पांडे ओझा ने बाल साहित्य की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि राष्ट्रीय चेतना को आगामी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए बाल साहित्य को ‘आत्मबोध से राष्ट्रबोध’ का माध्यम बनाना होगा। उन्होंने सोहनलाल द्विवेदी और निरंकार देव सेवक जैसे कवियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों को रामायण और महाभारत के मूल्यों के माध्यम से सही पोषण और संस्कार देना साहित्यकारों का परम दायित्व है।

जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के कुलगुरु प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ के संदर्भ में कहा कि शिक्षा में राष्ट्रीय चेतना का समावेश राष्ट्र की आत्मा से संवाद करने का सशक्त साधन है। उन्होंने साहित्यकार को एक ऐसा मनीषी बताया जो कठिनतम परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। उन्होंने भारतेंदु, प्रेमचंद और दिनकर को समाज को दिशा दिखाने वाली मशाल के रूप में याद किया।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के क्षेत्रीय संगठन मंत्री डॉ.विपिन चंद्र पाठक ने अखिल भारतीय साहित्य परिषद की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि संगठन साहित्य और समाज के मध्य सेतु का कार्य कर रहा है, जिसका मूल मंत्र “परहित” ही राष्ट्र चिंतन है। उन्होंने 6 मुख्य बिंदुओं पर सृजन करने की आवश्यक्ता पर बल दिया जिसमें भाषा, भेष , भजन दर्शन, भोजन, भ्रमण, भवन शामिल है। पाठक ने कहा कि इन 6 आधारों को समग्र रुप से देखें ,अनुभव करें , पूर्व में साहित्य पढ़ें और साहित्य विकास में भागीदारी करें ।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. मदन सिंह राठौड़ ने चेतना को एक समग्र इकाई बताया, जो व्यक्ति, परिवार और समाज से होकर राष्ट्र तक पहुँचती है। उन्होंने कहा कि चेतना को केवल विषयगत नहीं, बल्कि आत्मगत करना होगा। उन्होंने महाराणा प्रताप जैसे महान योद्धाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि यह चेतना ही है जो चरित्र निर्माण का आधार बनती है और हमें सही-गलत के प्रति जागरूक करती है। कार्यक्रम का संचालन डॉ.कुंजन आचार्य ने किया। धन्यवाद राजेश मेहता ने दिया।

तकनीकी सत्र-

मंगलवार को तृतीय सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने राजा जनक के दृष्टांत के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के शाश्वत मूल्यों को विश्लेषित किया। उन्होंने कहा कि वेद, वेदांत और योग दर्शन मात्र धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अष्टांग योग, यम-नियम और परा-विद्या ने समाज को एक सुव्यवस्थित दिशा प्रदान की है। डॉ. शर्मा के अनुसार, गीता प्राणी मात्र के कल्याण का ग्रंथ है और ऋग्वेद का मूल ‘मानव धर्म’ है, जो विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
इसी सत्र में विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ ने साहित्य की चेतना को परमात्मा की चेतना से जोड़ते हुए कहा कि भारतीय वाङ्मय ही हिंदी साहित्य का मूल स्रोत रहा है। उन्होंने कृष्ण-सुदामा की मित्रता के माध्यम से त्याग की पराकाष्ठा समझाई और फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ एवं महादेवी वर्मा की कविताओं के संदर्भ में ‘व्यष्टि से समष्टि’ की यात्रा को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रद्धाराम फुल्लौरी का उपन्यास ‘भाग्यवती’ नारी के उज्ज्वल पक्ष को समाज के सम्मुख रखता है। उनके अनुसार, सच्चा साहित्यकार वही है जो समाज को जोड़ने का कार्य करे।
मेवाड़ की धरा को नमन करते हुए जगजितेन्द्र सिंह ने पन्ना धाय, हाड़ी रानी और किरणा देवी जैसे ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से राष्ट्र चेतना को परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि लोक चेतना सदैव राष्ट्रहित में मुखर रही है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. रविन्द्र उपाध्याय ने विभीषण के चरित्र का विश्लेषण करते हुए राष्ट्रहित को व्यक्तिगत धर्म-संकट से ऊपर बताया।
चतुर्थ तकनीकी सत्र में डॉ. नीतू परिहार ने सेल्युलर जेल (निकोबार) के हृदयविदारक अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि कैसे स्वतंत्रता सेनानियों को एकांत कोठरियों में रखकर नारियल का सूत कातने और कोल्हू से तेल निकालने जैसी अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। उन्होंने कवि प्रदीप के राष्ट्रीय गीतों के माध्यम से उस कालखंड की पीड़ा और राष्ट्रप्रेम को अभिव्यक्ति दी। डॉ. महेश तिवारी ने राष्ट्रीय चेतना के बहुआयामी स्वरूप को प्रस्तुत किया। उन्होंने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, संवैधानिक और आर्थिक आयामों की चर्चा करते हुए कहा कि राष्ट्रीय नायक और प्रतीक हमारे सामूहिक गौरव के केंद्र हैं। उन्होंने सांख्य दर्शन और बुद्ध के आध्यात्मिक प्रवास को भारतीय शिक्षा प्रणाली के मूल मूल्यों के रूप में स्थापित किया।
प्रो. चंद्रकांता बंसल ने कबीर, माखनलाल चतुर्वेदी और वीरेंद्र मिश्र के काव्य का संदर्भ देते हुए बताया कि कबीर की समरसता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का भाव ही हमारी उन्नति का मार्ग है। उन्होंने मनुष्य के ‘अहं’ को प्रगति की सबसे बड़ी बाधा बताया और ‘स्वबोध’ से ‘विश्वबोध’ की यात्रा पर बल दिया।
सत्र के अध्यक्ष प्रदीप कुमावत ने एक महत्वपूर्ण वैचारिक स्थापना देते हुए कहा कि “फिलोसोफी ” भारतीय “दर्शन” का सटीक अनुवाद नहीं है। भारत का दर्शन केवल सूचनाओं का संप्रेषण नहीं, अपितु गहन चिंतन और अनुभव से प्राप्त ‘समझा गया ज्ञान’ है। डॉ नवीन नंदवाना ने सत्र के समापन पर धन्यवाद दिया।

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