सुविवि- ज्योतिषियों का दो दिवसीय महाकुंभ ‘ज्योतिष मंथन’ शुरू

 सुविवि- ज्योतिषियों का दो दिवसीय महाकुंभ ‘ज्योतिष मंथन’ शुरू

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग और ज्योतिष अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय वार्षिक अधिवेशन ‘ज्योतिष मंथन’ शनिवार को स्वर्ण जयंती अतिथि गृह सभागार में शुरू हुआ।

उद्धाटन सत्र के मुख्य अतिथि संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो विनोद शास्त्री ने कहा कि प्राचीन शास्त्र, संहिताये और टीकायें तात्कालीन समय और स्थितियों के अनुरूप लिखे गए थे। आज हालत बदल गए है, नई तकनीक और संचार उपकरणों के कारण अब पुरानी बातों को नई दृष्टि से देखने, समझने और व्याख्या करने की आवश्यकता है। ज्योतिषियों को भी इस बात को समझने की जरूरत है। हम लोग प्राचीन सूत्रों के लिहाज़ से ही फल कथन करने लगते है और सफलता नहीं मिलने पर निराश भी होते है। प्राचीन ज्योतिष विज्ञान को आज नए परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने की दिशा में कार्य किया जाना चाहिए।

वास्तु विशेषज्ञों के मौजूदा कामकाज पर पुनर्विचार का आग्रह करते हुए कहा कि हमको दिशाओं का ही नहीं वरन् दशाओं का भी विचार करना होगा क्योंकि भवन निर्माण की स्थितियां भी बदल गई है। घर शांति के लिए होता है उसके लिए भी प्रयास आवश्यक है। उन्होंने कहा की शादियों में अब कुंडली नहीं मिलाते बल्कि कमाई के पैकेज मिलाते है, पैकेज टूटते रहते है इसलिए शादियों के टूटने की संख्याएं बढ़ गई है। समय पर शादियां नहीं होना भी इसका एक कारण है। उन्होंने कहा की ज्योतिषी ब्रह्मा के एजेंट नहीं है उसे प्रायोगिक तरीके से देश काल परिस्थिति के अनुरूप फल कथन करना चाहिए।

संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो नीरज शर्मा ने अध्यक्षीय उद्बोधन में गुरु शिष्य परम्परा पर विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर वार्षिक स्मारिका का विमोचन भी किया गया।

ज्योतिष अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के अध्यक्ष पंडित हरिश्चंद्र शर्मा ने कुंडली में स्थित विभिन्न ग्रहों के व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभावों की सचित्र जानकारियाँ दी। सत्र का संचालन डा.मुरलीधर पालीवाल ने किया। संस्था के सचिव डा सुरेश जोशी ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। धन्यवाद दिलीप शर्मा ने दिया।

पहले दिन के अन्य सत्र: शोधपरक चर्चाएं-
इसके बाद आयोजित सत्र की अध्यक्षता डा सुरेश जोशी ने की। सत्र में डा कुंजन आचार्य ने हाल ही होली पर हुए उपछाया चंद्रग्रहण और उसके सूतक को लेकर उत्पन्न हुए असमंजस पर शोधपरक जानकारी दी। डा मनीष कश्यप ने संचित प्रारब्ध विषय पर विभिन्न मेडिकल केस स्टडीज़ के ज़रिए विस्तार से पूर्व जन्मों का और मौजूदा जन्मों के संबंधों को रेखांकित किया।
सचिन्द्र बरुआ ने गोचर में हस्त रेखाओं का विश्लेषण किया वहीं प्रकाश परसाई ने विवाह संबंधित समस्याओं और उससे जुड़ी अवधारणाओं में इस राहु चंद्र के योग को स्पष्ट किया।
संजय आमेटा ने पंचम भाव का फलित देखने की विभिन्न विधियों का विस्तार से स्पष्टीकरण किया वहीं चंद्रकांता कुमावत ने बाल विकास में ज्योतिष की भूमिका विषय पर प्रकाश डाला। अखिलेश शर्मा ने ज्योतिषीय मान्यताओं से जुड़ी विभिन्न भ्रांतियों का वैज्ञानिक पद्धति से निराकरण किया।
संध्याकालीन सत्र में सुधीर शांडिल्य की अध्यक्षता और उमेश आचार्य के संयोजन में विचार सत्र आयोजित किया गया। सत्र में प्रवीणा माथुर, मनोहर जोशी, नंद किशोर शर्मा ने शोधपरक आलेख प्रस्तुत किए।

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