पुरुषों में भी होती है मेनोपॉज जैसी अवस्था — प्रो. सुभाष हीरा


विद्या भवन पॉलिटेक्निक में आयोजित परिचर्चा में स्वास्थ्य और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बोले विश्व प्रसिद्ध जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ
महिलाओं में जिस प्रकार रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के समय शारीरिक, व्यवहारगत तथा भावनात्मक समस्याएँ होती हैं, उसी प्रकार पचास वर्ष की उम्र के पश्चात पुरुषों में भी मेनोपॉज जैसी अवस्था आती है। महिलाओं की तरह पुरुषों को भी स्वभावगत परिवर्तनों जैसे गुस्सा, चिड़चिड़ापन तथा शारीरिक क्षमताओं में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। महिलाओं और पुरुषों — दोनों में होने वाले इन परिवर्तनों को समझने की आवश्यकता है। चिंता की बात यह है कि इन अवस्थाओं में स्वभावगत परिवर्तनों और शारीरिक समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
यह विचार विश्व प्रसिद्ध जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, 140 देशों में एड्स, टीबी, मलेरिया, मंकीपॉक्स और कोविड-19 जैसी महामारियों के विरुद्ध काम कर चुके वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के प्रो. सुभाष हीरा ने विद्या भवन पॉलिटेक्निक सभागार में आयोजित परिचर्चा में व्यक्त किए।
‘पब्लिक हेल्थ, वेलबीइंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ विषयक इस परिचर्चा में डॉ. हीरा ने कहा कि पिछले वर्षों में विश्व ने प्लेग, स्पैनिश फ्लू, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू और हाल के वर्षों में कोविड जैसी अनेक महामारियों का सामना किया है। आने वाले समय में इबोला एक खतरनाक महामारी का रूप ले सकता है, जिसके लिए हमें तैयार रहना होगा।
उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी महामारियों की सदी है और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे बायोवार और बायोटेरर जैसी संभावनाएँ भी हो सकती हैं।
जेनेरिक दवाइयों को आम जन तक पहुँचाने में अग्रणी भूमिका निभाने वाले तथा जी-20 सम्मेलन में स्वास्थ्य विषय ट्रैक पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ. हीरा ने कहा कि लगभग 100 वर्ष पूर्व, जब स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित थीं, तब हमारी औसत आयु लगभग 35 वर्ष थी, जबकि आज उन्नत चिकित्सा सुविधाओं के कारण यह औसत आयु लगभग दोगुनी हो गई है।
हालाँकि, हाल के वर्षों में गैर-संचारी एवं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ — जैसे डायबिटीज, हाइपरटेंशन, कार्डियक अरेस्ट, वेस्कुलर डिज़ीज़, न्यूरल डिज़ीज़ और सर्वाइकल कैंसर — जीवन क्षति के प्रमुख कारण बन रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कोविड संक्रमण ने रक्त में थक्का जमने (ब्लड क्लॉटिंग) की समस्या को और बढ़ाया है।
प्रो. हीरा ने चिंता व्यक्त की कि विश्व में भारत टीबी मरीजों की संख्या के मामले में शीर्ष पर है। इसका जीवाणु खाँसने पर 40 फीट और चलती हवा के साथ 80 फीट तक फैल सकता है, जिससे भीड़भाड़ और बंद स्थानों में लोग आसानी से संक्रमित हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बहुत मददगार सिद्ध हो रही है, लेकिन यह केवल एक सहयोगी साधन है — यह मानवीय भावनाओं और संवेदनाओं का विकल्प नहीं बन सकती, जिनकी उपचार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
डॉ. हीरा ने कहा कि बहुत सी बीमारियाँ मानसिक स्वास्थ्य (मेंटल हेल्थ) पर ध्यान देने से ही ठीक की जा सकती हैं। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने G20 के तहत दो लाख वेलनेस सेंटर खोलने का निर्णय लिया है, जिनमें से अब तक 80 प्रतिशत से अधिक शुरू हो चुके हैं।
परिचर्चा का संचालन प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने किया। प्रारंभ में अकादमिक कोऑर्डिनेटर चंद्रेश अरोड़ा और विभागाध्यक्ष प्रकाश ने स्वागत उद्बोधन दिया।









