मेहता के नेतृत्व में नदी सुधार नीति व प्रबंधन पर हुआ सारगर्भित संवाद


आईआईटी दिल्ली एवं दिल्ली फार्मास्युटिकल विश्वविद्यालय में आयोजित ‘यमुना सुधार कार्यशाला’ में विद्या भवन के डॉ. मेहता मुख्य विशेषज्ञ के रूप में शामिल
नई दिल्ली/उदयपुर।
नदी सुधार और संवर्धन के लिए आवश्यक है कि उसके फ्लड प्लेन को सुरक्षित रखते हुए उसे जैव विविधता से समृद्ध बनाया जाए। नदी संरक्षण की शुरुआत फ्लड प्लेन से ही होनी चाहिए। साथ ही नदी सुधार नीति में सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, पारिस्थितिकीय परंपराओं एवं मूल्यों का समावेश किया जाना चाहिए।
यह विचार विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने 9 सितंबर को आयोजित ‘यमुना सुधार कार्यशाला’ में मुख्य विशेषज्ञ के रूप में व्यक्त किए। यह कार्यशाला आईआईटी दिल्ली तथा दिल्ली फार्मास्युटिकल विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुई।


‘नदी के लिए नीति, शासन एवं प्रबंधन’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. मेहता ने कहा कि नदी का चैनलाइजेशन उसकी मूल प्रकृति के विपरीत है। नदियों में गिर रहे गंदे पानी का उपचार स्रोत पर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शहरों के मास्टर प्लान रिवर-सेंट्रिक (नदी केंद्रित) होने चाहिए ताकि शहरी विकास नदी के हित में हो। नदियों में उत्पन्न हो रहे इमर्जिंग कॉन्टमिनेंट्स (नई प्रकार की प्रदूषक सामग्री) के समाधान हेतु जैविक उपचार विधियों को अपनाना जरूरी है। डॉ. मेहता ने ‘ग्रीन अप्रोच’ (हरित दृष्टिकोण) के माध्यम से नदी सुधार की दिशा में नवीन उपायों पर भी प्रकाश डाला।
दिल्ली विकास प्राधिकरण की उपायुक्त कल्पना खुराना ने दिल्ली में यमुना नदी की 22 किलोमीटर लंबाई की वस्तुस्थिति प्रस्तुत की।
एनजीटी एवं सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरणीय मुद्दों के विशेषज्ञ एडवोकेट ओम शंकर श्रीवास्तव ने नदी से संबंधित मौजूदा कानूनों की जानकारी दी।
कार्यशाला में विशेषज्ञ डॉ. शिखा, डॉ. महावीर, एवं डॉ. सिम्मी ने भी अपने विचार साझा किए।
उद्घाटन सत्र में नदी के पारिस्थितिकीय एवं सांस्कृतिक आयामों को रेखांकित करते हुए डॉ. मेहता ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जीवनशैली में आए बदलाव और अंधाधुंध विकास प्रक्रिया से नदियों की सुरक्षा अत्यंत आवश्यक है। नदी केवल जल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का स्रोत है।
दो दिवसीय इस कार्यशाला में आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार, डॉ. श्रीकृष्णनन, डॉ. शिल्पी, डॉ. गोसाइन सहित नीरी, जेएनयू, सीएसई, एनआईएयू और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यशाला की अध्यक्षता दिल्ली फार्मास्युटिकल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रविचंदेरन ने की।









