उदयपुर में वन अधिकार कानून पर अनोखा प्रदर्शन, ढोल-नगाड़ों संग सैकड़ों लोग जुटे


उदयपुर में वन अधिकार कानून की प्रभावी पालना और लंबित दावों के निस्तारण की मांग को लेकर बुधवार को संभागीय आयुक्त कार्यालय के बाहर बड़ा प्रदर्शन किया गया। जंगल जमीन जन आंदोलन के बैनर तले संभाग के विभिन्न जिलों से आए सैकड़ों लोगों ने ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक तरीके से विरोध जताते हुए सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाई।
प्रदर्शन में उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, राजसमंद, सिरोही, भीलवाड़ा, बूंदी और कोटा सहित कई जिलों से करीब 300 से अधिक लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून लागू होने के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में पात्र लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं।


आंदोलन के संयोजक धर्मचंद खेर ने बताया कि प्रदेश में करीब 11 लाख 18 हजार व्यक्तिगत दावे पेश किए गए, लेकिन अब तक केवल 52 हजार लोगों को ही पट्टे मिल पाए हैं। उन्होंने कहा कि हजारों दावे आज भी लंबित पड़े हैं, जिससे आदिवासी और वन क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि लंबित व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों का जल्द निस्तारण किया जाए। साथ ही जिन लोगों को पट्टे जारी हो चुके हैं, उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए जाएं ताकि वे कृषि बिजली कनेक्शन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ ले सकें।
सामुदायिक वन अधिकारों को लेकर भी नाराजगी देखने को मिली। आंदोलनकारियों का कहना था कि राजस्थान के लगभग 10 हजार वन क्षेत्र वाले गांवों में से अब तक केवल 2088 गांवों को ही सामुदायिक वन अधिकार मिले हैं, जो बेहद कम है।
भीषण गर्मी और शादियों के सीजन के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने आंदोलन की गंभीरता को साफ दिखाया। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।









