पुलक सागर जी बोले: बीमारियाँ तन से नहीं, मन से जन्म लेती हैं


उदयपुर, 28 सितम्बर। “चिकित्सक तन का इलाज करते हैं और आध्यात्म मन का। अधिकतर बीमारियाँ तन से नहीं, बल्कि मन से उत्पन्न होती हैं। इसलिए मनुष्य को हमेशा अपने विचारों में सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। बीमारी शरीर में दिखाई देती है, लेकिन उसका मूल हमारे विचारों में होता है। तन की बीमारी का इलाज दवाइयों से हो सकता है, लेकिन मन की शांति और उपचार केवल आध्यात्म, पवित्र विचारों और ईश्वर की शरणागत से संभव है।” यह विचार जैन संत पुलक सागर जी महाराज ने व्यक्त किए।
वे पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के पेसिफिक सेंटर ऑफ न्यूरोसाइंसेज द्वारा “न्यूरोथियोलॉजी” विषय पर सुखाड़िया रंगमंच, नगर निगम परिसर, टाउन हॉल, उदयपुर में आयोजित ‘उदयपुर कोर्स ऑन न्यूरोसाइंसेज’ के 12वें राष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।
भारतीय संस्कृति और आध्यात्म
जैन संत पुलक सागर जी महाराज ने “वर्तमान भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों में आध्यात्मिकता की भूमिका” विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल आधार आध्यात्मिकता है। हमारी परंपराएँ, संस्कार और जीवनशैली सभी आध्यात्मिक मूल्यों से ओत-प्रोत हैं। यही कारण है कि भारत सदियों से ज्ञान, शांति और आत्मकल्याण का मार्गदर्शक रहा है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भौतिकवाद और भागदौड़ भरी जिंदगी ने लोगों को मानसिक रूप से अशांत और असंतुलित बना दिया है। ऐसे में भारतीय संस्कृति में निहित आध्यात्मिकता ही वह आधार है, जो व्यक्ति को आंतरिक शांति, संतुलन और उद्देश्य की ओर ले जा सकती है।
चिकित्सा में आध्यात्मिकता की भूमिका
इस अवसर पर पेसिफिक मेडिकल विश्वविद्यालय के चेयरपर्सन राहुल अग्रवाल एवं प्रीति अग्रवाल ने डॉ. अतुलाभ वाजपेयी को शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए कहा कि आध्यात्मिकता और गाइडेड मेडिटेशन जैसे अभ्यास आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक संतुलन एवं नैतिक मूल्यों की स्थापना में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
न्यूरोसाइंसेस विभाग के प्रोफेसर एवं हेड डॉ. अतुलाभ वाजपेयी ने “न्यूरोथियोलॉजी : मानव, राष्ट्र और विश्व के उत्थान का मार्ग” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मानव मस्तिष्क की ऊर्जा और चेतना को सही दिशा में प्रयोग कर हम न केवल व्यक्तिगत जीवन को उत्कृष्ट बना सकते हैं, बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के विकास में भी योगदान दे सकते हैं।
डॉ. वाजपेयी ने बताया कि न्यूरोथियोलॉजी एक उभरता हुआ विज्ञान है, जो मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र और ध्वनि (ध्वनि चिकित्सा) के आपसी संबंधों को समझने का कार्य करता है। उनका मानना है कि मंत्र, संगीत और सकारात्मक ध्वनियों का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे तनाव, अवसाद और मानसिक रोगों का प्रभावी इलाज संभव है।
आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता (Spiritual Intelligence)
इस कार्यक्रम में अध्यात्म का न्यूरोलॉजिकल और वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि हमारा बुद्धिमान भागफल (I.Q.) लेफ्ट ब्रेन को नियंत्रित करता है, जबकि भावनात्मक गुणक (E.Q.) राइट ब्रेन से संचालित होता है। जब दोनों समन्वय के साथ कार्य करते हैं तो Spiritual Quotient (S.Q.) का निर्माण होता है, जो उच्च विद्वता और संतुलित जीवन का मानक है। इसके विकास से व्यक्ति को सुख, शांति, करुणा और स्नेह की अनुभूति होती है तथा वह तनावमुक्त रह पाता है। उन्होंने कहा कि योग, ध्यान और प्राणायाम S.Q. के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।
सोल-ब्रेन इंटरफेस की खोज
ब्रह्माकुमारी संस्था के वरिष्ठ राजयोग प्रशिक्षक बी.के. गिरीश ने “सोल-ब्रेन इंटरफेस की खोज” विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि मानव मस्तिष्क और आत्मा के बीच गहरा संबंध है, जिसे अब चिकित्सा, विज्ञान और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझा जा रहा है। आधुनिक न्यूरोसाइंस जहां मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली पर काम कर रही है, वहीं राजयोग ध्यान आत्मा की ऊर्जा और चेतना के अनुभव को जागृत करता है।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक शोध से यह साबित हो रहा है कि ध्यान और सकारात्मक विचारधारा से मस्तिष्क की तरंगों में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य, निर्णय क्षमता और भावनात्मक संतुलन में सुधार होता है।
गाइडेड मेडिटेशन का महत्व
ब्रह्माकुमारी संस्था की वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका बी.के. उषा ने “दैनिक जीवन में आध्यात्मिकता एवं गाइडेड मेडिटेशन” विषय पर प्रेरणादायक सत्र का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता को जीवन में अपनाकर हम तनाव, चिंता और अशांति से मुक्त होकर संतुलित एवं सुखद जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ध्यान कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच का गहरा संबंध है। गाइडेड मेडिटेशन से व्यक्ति यह अनुभव करता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि एक शांत, शक्तिशाली और ज्योतिर्मय आत्मा है। यही अनुभव जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मकता और स्थिरता लाता है।
इस अवसर पर अन्य न्यूरो विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे।
राष्ट्रीय सम्मेलन का मंच संचालन डॉ. आनंद गुप्ता ने किया।









