कर्ज की बुनियाद पर खड़ा भविष्य: सिमटती बचत और खोखला होता युवा भारत

 कर्ज की बुनियाद पर खड़ा भविष्य: सिमटती बचत और खोखला होता युवा भारत

लेखक: भगवान प्रसाद गौड़

भारत की पहचान कभी ‘बचत करने वाले समाज’ के रूप में थी। हमारे संस्कारों में यह रचा-बसा था कि “कमाओ दस, तो बचाओ चार।” लेकिन आज की चकाचौंध भरी जीवनशैली ने इस दर्शन को उलट दिया है। अब मंत्र बन गया है—“कमाओ दस, तो उड़ाओ बीस।” यह लेख केवल युवाओं की बिगड़ती आदतों पर नहीं, बल्कि उस आर्थिक गर्त पर केंद्रित है, जिसमें हमारा राष्ट्र अनजाने में फिसलता जा रहा है।

हालिया आर्थिक आँकड़े बताते हैं कि भारत की शुद्ध घरेलू बचत, जीडीपी के अनुपात में दशकों के निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। जब किसी देश की घरेलू बचत घटती है, तो भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटने का सुरक्षा कवच भी कमजोर पड़ जाता है। जिस समाज के पास बचत नहीं होती, वह अंततः अपनी आर्थिक स्वतंत्रता साहूकारों और विदेशी शक्तियों के हाथों गिरवी रख देता है।

आज का युवा वर्ग जीडीपी वृद्धि में योगदान तो दे रहा है, लेकिन यह योगदान उत्पादन से अधिक अंधाधुंध उपभोग पर आधारित है। केवल खर्च से पैदा हुआ विकास स्थायी नहीं हो सकता। यह एक ऐसा बुलबुला है, जो किसी भी आर्थिक झटके में फूट सकता है।

यह माना जा रहा था कि कोरोना जैसी वैश्विक त्रासदी के बाद लोग जीवन की नश्वरता और आर्थिक सुरक्षा के महत्व को समझेंगे। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। महामारी के बाद ‘रिवेंज स्पेंडिंग’ का दौर आया, जिसने युवाओं को और अधिक विवेकहीन बना दिया। संकट से सबक लेने के बजाय, “कल किसने देखा है” की सोच ने फिजूलखर्ची को बढ़ावा दिया।

परिणामस्वरूप, जिस धन का उपयोग स्वास्थ्य, आपातकालीन जरूरतों और भविष्य की सुरक्षा में होना चाहिए था, वह पब, पार्टियों, महंगे गैजेट्स और लग्जरी कारों में बहने लगा।

आज की पीढ़ी ऑनलाइन लोन और क्रेडिट कार्ड के उस दलदल में फँसी हुई है, जहाँ से निकलना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। सोशल मीडिया पर ‘लाइक’ और ‘कमेंट्स’ की भूख ने युवाओं को उनकी आर्थिक हैसियत से कहीं आगे खर्च करने के लिए मजबूर कर दिया है।

नशे ने युवाओं की निर्णय लेने की क्षमता को कुंद कर दिया है। एक ओर शरीर बीमारियों का घर बन रहा है, तो दूसरी ओर दिमाग कर्ज की किश्तों के बोझ तले विवेकहीन होता जा रहा है।

रातों में पार्टी, दिन में देर तक सोना और धूम्रपान को ‘कूल’ समझना आधुनिकता नहीं, बल्कि एक आत्मघाती मानसिक रोग का संकेत है, जो व्यक्ति और समाज—दोनों को भीतर से खोखला कर रहा है।

यह एक कड़वा सच है कि सरकार की कुछ नीतियाँ भी जाने-अनजाने इस उपभोगवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। चारों ओर केवल ‘खर्च करो’ का संदेश है। विज्ञापन और ई-कॉमर्स कंपनियाँ युवाओं को लालच के जाल में फँसाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।

सरकार को उपभोग नहीं, बल्कि बचत पर आधारित प्रोत्साहनों की स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। जिस तरह ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ एक राष्ट्रीय अभियान बना, उसी तरह ‘युवा बचाओ, बचत बढ़ाओ’ को भी जनआंदोलन का रूप देना होगा।

भारतीय संस्कृति ने सदैव संतुलित जीवन का मार्ग दिखाया है। रामायण में भरत का चरित्र हो या विदुर नीति, हर जगह धन के अपव्यय को पाप माना गया है—
“मितं ददाति हि पिता, मितं भ्राता मितं सुतः।
अमितस्य हि दातारं भर्तारं का न पूजयेत॥”

यदि आज हमने बचत नहीं की, तो कल स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए भी कर्ज लेना पड़ेगा। कर्ज पर टिका जीवन कभी ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना पूरा नहीं कर सकता। यदि अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल उपभोक्ता बनकर रह जाएँगी, उत्पादक नहीं। समय है आत्ममंथन का, समय है सनातन के ‘संयम’ को फिर से अपनाने का—क्योंकि बिना बचत के कोई भी राष्ट्र संकट के थपेड़ों को नहीं झेल सकता।

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