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ज़िन्दगी में कुछ करने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, हौसला चाहिए


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अक्सर 50 पार करते ही लोग बुढ़ापे को महसूस करने लगते है, इन्फेक्ट बुढ़ापा घोषित ही कर देते है पर 56 वर्षीय महेश वाघमारे हर साल जवान होते नज़र आरहे है, इनको देख कर एक बार तो जवान युवा भी इन्फीरियरीटी काम्प्लेक्स महसूस करते है.  चौड़ी छाती, सिक्स पैक एब्स, शानदार बाइसेप्स – उदयपुर शहर के कुछ सबसे सीनियर बॉडी बिल्डर्स में से एक और जाने माने पर्सनल ट्रेनर महेश वाघमारे की कहानी में कई उतार चढ़ाव आये पर इन्होने हिम्मत नहीं हारी.

गरीबी, असाक्षरता और बेरोज़गारी, वाघमारे के अटल विश्वास और दृढ निश्चय के सामने कुछ नहीं टिक पाया. और आज वे एक प्रेरणा के रूप में हर आयु और वर्ग के लोगो को इंस्पायर कर रहे है, ट्रेन कर रहे है.

यह है महेश वाघमारे की कहानी उन्ही की ज़ुबानी


जहां दिन में दो वक़्त की रोटी के फाफे थे वही मैंने एक सपना देख लिया, एक सफल बॉडी बिल्डर बनने का. घर में 8 भाई-बहन और माँ जबकि कमाने वाले सिर्फ पिताजी जो इंदौर की कपडा मील में अदना सी नौकरी करते थे.

घर से 12 किलोमीटर दूर एक जिम था और मेरे पास न जिम की फीस के पैसे थे न ही कुछ खाने के फिर भी एक दिन हिम्मत जुटा के साइकिल पर चला गया और जिम के मालिक मोहन सिंह राठौर को अपना हाल बताया. उन्होंने मेरे साथ एक डील की, रोज़ सवेरे 5 बजे अगर मैंने उनका जिम ओपन कर दिया तो मुझे फीस माफ़. उनको एक केयरटेकर चाहिए था और मुझे जिम. उस दिन मानो मुझे सब मिल गया.

जैसे तैसे पिताजी को मनाया, वे मान भी गए, खाने-पीने के लिए सस्ते जुगाड़ किये जैसे चना आदि.

बस फिर क्या था, में पहुँच जाता था समय से पहले, हर रोज़, बिना किसी छुट्टी के. मेरी लगन और  बॉडी बिल्डिंग के प्रति दीवानेपन ने मेरे गुरु को प्रभावित कर दिया और उन्होंने मुझे आगामी बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता के लिए प्रोतसाहित किया. फिर मैंने पीछे मुड़ के नहीं देखा, 1981-85 मिस्टर इंदौर, 1986 में मिस्टर मालवा फिर राजस्थान में कई अवार्ड, नेशनल लेवल में 5वा स्थान और 2015-16 नेशनल लेवल में स्वर्ण पदक हासिल किया.

शादी के बाद अपनी पत्नी को लेकर उदयपुर आगया था और 28 साल से यही बस गया, सबसे पहले नाथद्वारा के काफी समय से बंद पड़े एक जिम को शुरू किया फिर कई जगह छोटी मोटी नौकरी करता रहा, बॉडी बिल्डिंग कभी नहीं छोड़ी, आज तक कर रहा हूँ और करता रहूँगा.

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